सोचिए, पाँच हज़ार साल पहले। कोई अस्पताल नहीं, कोई MRI नहीं। फिर भी लोग स्वस्थ रहते थे। कैसे? शायद उनके पास कोई गुप्त ज्ञान था। आज हम जानेंगे आयुर्वेद और सिंधु घाटी सभ्यता के बीच के रिश्ते के बारे में। ये सवाल कि “आयुर्वेद और सिंधु सभ्यता का रिश्ता क्या है” बहुत दिलचस्प है। क्या प्राचीन भारतीय चिकित्सा की जड़ें इसी सभ्यता में हैं? चलिए, इस रहस्य पर से पर्दा उठाते हैं।

हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसे शहर सिर्फ ईंटों के ढेर नहीं थे। वे बेहतरीन नगर-नियोजन के उदाहरण थे। बड़ी-बड़ी सड़कें, नालियों का जाल, और सार्वजनिक स्नानागार। ये सब एक विकसित समाज की निशानी हैं। और एक विकसित समाज को स्वास्थ्य के नियमों का भी पता होता है। यहीं से आयुर्वेद का इतिहास शुरू होने की संभावना है।

वैज्ञानिकों ने खुदाई में कई ऐसी चीज़ें खोजी हैं जो दवाइयों से जुड़ी हैं। जड़ी-बूटियों के अवशेष, मिट्टी के बर्तन जिनमें कुछ द्रव्य रखे जाते थे, और यहाँ तक कि दांतों के अध्ययन से पता चलता है कि लोगों का आहार बहुत संतुलित था। ये सभी pieces of the puzzle हैं जो प्राकृतिक चिकित्सा की ओर इशारा करते हैं।

सिंधु सभ्यता के लोग कैसे रहते थे? 🏺

उनकी जीवनशैली ही उनके स्वास्थ्य का राज़ थी। नगरों में पानी की शुद्ध व्यवस्था और सफाई पर ज़ोर दिया जाता था। ये बातें आयुर्वेद के मूल सिद्धांतों से मेल खाती हैं। आयुर्वेद कहता है कि स्वच्छता और संतुलित आहार अच्छे स्वास्थ्य की नींव हैं। है ना दिलचस्प? एक अध्ययन के मुताबिक, हड़प्पा काल के लोगों के कंकालों में कुपोषण के लक्षण बहुत कम पाए गए, जो उनके पोषण के ज्ञान को दर्शाता है।

माना जाता है कि उनके यहाँ योग और ध्यान की भी प्रथाएँ थीं। मोहनजोदड़ो से मिली एक मुहर पर एक व्यक्ति को ध्यान की मुद्रा में बैठे दिखाया गया है। कई विद्वानों का मानना है कि यह भगवान शिव का प्रारंभिक रूप हो सकता है, जो योग के अधिष्ठाता हैं। और योग, आयुर्वेद की ही एक सहोदर विद्या है।

वैदिक काल: कड़ी जो जोड़ती है?

अब सवाल ये उठता है कि सिंधु सभ्यता के बाद ये ज्ञान गया कहाँ? जैसे-जैसे सिंधु सभ्यता का पतन हुआ, उसका ज्ञान नए समाजों में घुल-मिल गया। यहीं आता है वैदिक काल का role। वैदिक साहित्य, जैसे ऋग्वेद और अथर्ववेद, में आयुर्वेद के बीज मौजूद हैं।

अथर्ववेद में मिलते हैं आयुर्वेद के सूत्र

अथर्ववेद को आयुर्वेद का प्रारंभिक स्रोत माना जाता है। इसमें हज़ारों मंत्र हैं जो रोगों के निदान और उपचार के लिए हैं। ये मंत्र सिर्�़फ जादू-टोना नहीं थे। इनमें जड़ी-बूटियों के गुणों का वैज्ञानिक विवरण छुपा है।

  • रोगों का वर्गीकरण: वैदिक ग्रंथों में रोगों को दोषों (वात, पित्त, कफ) के असंतुलन के रूप में वर्णित किया गया है।
  • औषधियों का प्रयोग: तुलसी, हल्दी, और अश्वगंधा जैसी जड़ी-बूटियों का उल्लेख मिलता है।
  • शल्य चिकित्सा: ऋग्वेद में ‘अश्विनी कुमारों’ द्वारा की गई शल्य क्रियाओं का ज़िक्र है।

ऐसा लगता है कि सिंधु सभ्यता का व्यावहारिक ज्ञान और वैदिक काल का दार्शनिक ज्ञान मिलकर ही आयुर्वेद के रूप में विकसित हुआ। ये एक सहज evolution था।

क्या स

Categorized in: