क्या आप भी उस दुविधा में फंसे हैं जहाँ प्रोटीन की चाह और यूरिक एसिड का डर साथ-साथ चलते हैं? आप अकेले नहीं हैं। बॉडी बनाने या हेल्दी रहने के चक्कर में कई बार हमारी प्रोटीन डाइट ही गाउट जैसी समस्या की वजह बन जाती है। सवाल यही है कि प्रोटीन लें पर यूरिक एसिड न बढ़े, यह कमाल कैसे हो? चलिए, आज इसी पहेली को सुलझाते हैं।
मेरे एक क्लाइंट, राहुल की कहानी सुनिए। उन्होंने जिम ज्वाइन किया और खूब हाई प्रोटीन डाइट ली। चिकन, अंडे, सप्लीमेंट्स… सब कुछ। लेकिन कुछ महीनों बाद उनके पैर के अंगूठे में इतना दर्द हुआ कि चलना मुश्किल हो गया। डॉक्टर ने बताया – यूरिक एसिड कंट्रोल से बाहर है। यही वो पल था जब उन्हें एहसास हुआ कि सिर्फ प्रोटीन खाना काफी नहीं, सही प्रोटीन खाना ज़रूरी है।
तो क्या प्रोटीन छोड़ दें? बिल्कुल नहीं! प्रोटीन तो हमारे शरीर की बिल्डिंग ब्लॉक्स हैं। असल मुद्दा है चुनाव का। कुछ प्रोटीन के स्रोत यूरिक एसिड बढ़ाते हैं, तो कुछ नहीं। यह जानना ही गेम-चेंजर है।

यूरिक एसिड बढ़ता क्यों है? पहले ये समझें
इसे साधारण भाषा में समझें। हमारा शरीर प्यूरीन नाम के केमिकल को तोड़कर यूरिक एसिड बनाता है। कुछ खाद्य पदार्थों में ये प्यूरीन ज़्यादा होते हैं। जब यूरिक एसिड ज़्यादा बनने लगे और किडनी उसे ठीक से बाहर न निकाल पाए, तो यह जोड़ों में जमा होकर दर्द पैदा करता है। इसे ही गाउट अटैक कहते हैं।
अब मज़ेदार बात ये है कि सारे प्रोटीन स्रोत प्यूरीन से भरे नहीं होते। यहीं पर हमें अपनी स्ट्रैटजी बनानी है।

स्मार्ट प्रोटीन चुनाव: क्या खाएं, क्या न खाएं?
आपका फोकस ‘लो-प्यूरीन’ प्रोटीन स्रोतों पर होना चाहिए। एक स्टडी के मुताबिक, सही डाइट से यूरिक एसिड का लेवल 20-30% तक कम किया जा सकता है। ये रहे आपके बेस्ट दोस्त:
बिल्कुल सेफ बेट्स (खाएं बिना डरे):
- अंडे की सफेदी: प्रोटीन का शुद्ध स्रोत, प्यूरीन न के बराबर।
- दूध और दही: लो-फैट वाले विकल्प और भी बेहतर। ये यूरिक एसिड को शरीर से बाहर निकालने में भी मदद करते हैं।
- दालें और फलियाँ: मूंग दाल, मसूर दाल, राजमा (सीमित मात्रा में)। इनमें फाइबर भी भरपूर है।
- नट्स और बीज: बादाम, अखरोट, फ्लैक्ससीड्स। हां, लेकिन मुट्ठी भर ही खाएं।
जिनसे थोड़ा दूरी बनाएं (मॉडरेशन है ज़रूरी):
- रेड मीट और ऑर्गन मीट: ये प्यूरीन के किंग हैं। बिल्कुल कम या अवॉइड करें।
- समुद्री भोजन: श्रिम्प, स्कैलप्स, सार्डिन्स में प्यूरीन हाई होता है। सैल्मन थोड़ी बेहतर ऑप्शन है।
- मीट एक्सट्रैक्ट और ग्रेवी: इनसे पूरी तरह परहेज़ करें।
याद रखें, मॉडरेशन की कुंजी है। हफ्ते में दो-तीन बार चिकन या फिश का एक छोटा पीस खाना, रोज़ाना प्लेट भरकर खाने से कहीं बेहतर है।


